केरल से आयी बेहद सनसनीखेज खबर से दहल उठी सोनिया, 60 सालों की मेहनत पर फिरा पानी

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नई दिल्ली : कांग्रेस राज में खरबों रुपये खर्च करके मिशनरीज़ द्वारा लाखों हिन्दुओं का धर्म परिवर्तन कर दिया गया. एनजीओ व् अन्य समाजसेवी संगठनों का सहारा ले कर दलित, पिछड़े हुए व् गरीब हिन्दू परिवारों को लोभ-लालच देकर ईसाई बना लिया गया. मगर अब एक ऐसी सनसनीखेज खबर सामने आ रही है, जिसने खरबों रुपये खर्च करने वाले इन मिशनरीज की भी नींदें उड़ा दी हैं.

केरल में बड़े पैमाने पर हो रही है घर वापसी

ईसाई धर्म में बड़े पैमाने पर भेदभाव से परेशान कई दलित परिवार अब वापस हिंदू धर्म अपना रहे हैं. ये ट्रेंड सबसे ज्यादा दक्षिण भारत के राज्यों केरल और तमिलनाडु में देखा जा रहा है. जहां तक केरल की बात है, यहां बड़े पैमाने पर दलित परिवारों ने हिंदू धर्म में वापसी की है. केरल सरकार के गजट में जारी आंकड़ों के मुताबिक 2015 में 1335 लोगों ने आधिकारिक तौर पर अपने धर्म बदले, जिनमें से 660 ईसाई थे, जिन्होंने वापस हिंदू धर्म को अपनाया है.

वापस हिन्दू बनने वालों में से ज्यादातर वो परिवार हैं, जिन्होंने बीते एक दशक में ईसाई मिशनरियों के असर में आकर धर्मांतरण कर लिया था. केरल में धर्म बदलने के बाद उसे कानूनी जामा पहनाने के लिए गजट नोटिफिकेशन छपवाना जरूरी होता है.

भेदभाव से तंग आकर घर वापसी कर रहे हैं दलित

केरल सरकार के पिछले साल के आंकड़ों के मुताबिक़ यह चलन साल-दर-साल बढ़ रहा है. 2016 के जुलाई महीने तक केरल में 780 धर्मांतरण रजिस्टर किए गए थे. इनमें से 402 ईसाई से हिंदू बनने के मामले थे. देश में कुल ईसाई आबादी का 95 फीसदी दलित जातियों के लोग हैं, जिन्होंने धर्मांतरण करके ईसाई धर्म अपनाया था. इन लोगों में से कइयों ने हिन्दू धर्म में होने वाले भेदभाव से तंग आकर व् अन्य ने लालच में आकर ईसाई धर्म अपना लिया था.

लेकिन उन्हें ना तो किसी किस्म के धार्मिक अधिकार मिले, ना ही सामाजिक समानता हासिल हुई. उलटा इन लोगों का कहना है कि सबसे ज्यादा भेदभाव ईसाई धर्म में ही है. केरल में जुलाई 2016 से पहले के 19 महीनों में सबसे ज्यादा 1189 ईसाइयों ने धर्मांतरण किया. इसके बाद हिंदुओं की संख्या आती है जिनके 840 लोगों ने धर्म बदला. इनमें सबसे ज्यादा लव जिहाद के मामले रहे. जबकि 85 लोगों ने इस्लाम को छोड़ा.

दूर के ढोल सुहावने थे, पास जाकर असलियत पता चली

बताया जा रहा है कि इस्लाम छोड़ने वालों की संख्या इसलिए कम है, क्योंकि ऐसा करने वालों को हत्या का डर रहता है. केरल के ‘कन्वर्टेड’ ईसाइयों के संगठन के पदाधिकारी एन. रवींद्रन का कहना है कि “ईसाई बने दलितों की स्थिति बेहद खराब है. जब हम हिंदू थे तो बेहतर स्थिति में थे, हम ईसाई बनने के बावजूद दलित और अछूत हैं.”

उनका कहना है कि “हमें शिक्षा में मदद और नौकरियों में एक फीसदी आरक्षण के अलावा कुछ भी नहीं मिलता. जबकि हिंदू दलितों को अनुसूचित जाति होने के कारण शिक्षा से लेकर मकान, शादी और इलाज तक में सरकारी मदद मिलती है.

ज्यादातर लोगों का कहना है कि ईसाई बनने के बाद जब लोगों ने पाया कि उनकी समाजिक और आर्थिक स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया तो उन्होंने वापस हिंदू धर्म अपनाना ही बेहतर समझा. क्योंकि उनसे दूसरे ईसाई शादी वगैरह के रिश्ते भी नहीं रखते. उनके साथ अत्याचार होते हैं और उसकी शिकायत भी नहीं की जा सकती.

हिंदुओं में सामाजिक सुधार तेज

दलित ईसाइयों के संगठन के पूर्व प्रमुख शिन्स पीटर का कहना है कि “लोगों में यह आम धारणा बनती जा रही है कि हिन्दू समाज ज्यादा सहनशील है, इसलिए ईसाइयों और मुसलमानों के मुकाबले हिंदू समाज में सामाजिक बदलाव आसानी के साथ होते हैं. पहले दलितों की स्थिति खराब थी, लेकिन अब तेजी से बदलाव आया है.

ऊंची जातियों की नई पीढ़ी में जातिवाद ना के बराबर है. इसके उलट ईसाई और मुसलमानों में धर्मांतरण करने वाले दलितों को तुच्छ नजर से देखा जाता है.” इसके अलावा आरक्षण भी बड़ा कारण है जिससे हिंदू धर्म में रहना फायदेमंद माना जा रहा है.

यानी खरबों रुपये खर्च करके धर्म परिवर्तन कराने का कोई लाभ नहीं हुआ. धर्म-परिवर्तन कर चुके लोग खुद-ब-खुद घर वापसी कर रहे हैं. ऊपर से मोदी सरकार ने विदेशी चंदे से अवैध तरीके से धर्म परिवर्तन में लिप्त एनजीओ में ताले भी लगवा दिए हैं. ऐसे में 60 सालों से चला आ रहा सारा खेल एक झटके में ही बिगड़ गया है.

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