मोदी के चीन से लौटते ही बीजिंग ने भारत के लिए लिया ऐसा जबरदस्त फैसला, सारी दुनिया रह गयी हैरान

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नई दिल्ली : पीएम मोदी की कूटनीति का डंका दुनियाभर में बज रहा है. अमेरिका से लेकर रूस और इजराइल तक आज भारत के साथ संबंधों पर जोर दे रहे हैं. कुछ ही दिन पहले चीन गए पीएम मोदी की ताकत का लोहा तो चीन ने भी मान लिया है और चीन से अब एक ऐसी खबर आ रही है, जिसकी दुनियाभर में चर्चा हो रही है.

बेल्ट एंड रोड परियोजना पर झुका चीन

चीन ने फैसला लिया है कि यदि भारत को बीजिंग की अरबों डॉलर की बेल्ट एंड रोड परियोजना से जुड़ने में दिक्कत है, तो वो इसके लिए नई दिल्ली पर दबाव नहीं डालेगा. दरअसल भारत चीन की इस महत्वाकांक्षी परियोजना का विरोध करता आया है, क्युकि इसका मुख्य हिस्सा चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (सीपीईसी) पीओके से होकर गुजरता है, जोकि भारत का हिस्सा है मगर नेहरू के निकम्मेपन के कारण इस पर पाकिस्तान ने कब्जा कर लिया था.

चीन के उप विदेश मंत्री कोंग सुआनयू ने कहा, “मैं महसूस करता हूं कि इंटर-कनेक्टिविटी को समर्थन करने के मुद्दे पर चीन और भारत के बीच कोई बुनियादी मतभेद नहीं है.” कोंग ने कहा, “भारतीय पक्ष इस सहयोग से बाहर नहीं है. यह अंतरसंपर्क पर आगे बढ़ना जारी भी रखे हुए है. भारत एशियाई अवसंरचना निवेश बैंक (एआईआईबी) का एक संस्थापक सदस्य भी है. हमारे क्षेत्र का यह दूसरा सबसे बड़ा शेयरधारक है.”

भारत के साथ संबंधों पर जोर

उन्होंने कहा, “जहां तक बेल्ट एंड रोड को भारत द्वारा स्वीकार करने या न करने का सवाल है, मैं समझता हूं कि यह महत्वपूर्ण नहीं है और चीन इसके लिए अधिक दबाव नहीं बनाएगा.” सप्ताह के प्रारंभ में संपन्न हुए आठ सदस्यों वाले शंघाई सहयोग शिखर सम्मेलन के विदेश मंत्रियों की बैठक में सिर्फ भारत ने बेल्ट एंड रोड परियोजना का समर्थन नहीं किया था.

मई 2017 में भारत ने चीन के बेल्ट एंड रोड सम्मेलन में हिस्सा नहीं लिया था. चीन इस परियोजना को आर्थिक बताता है और कहता है कि इससे भारत और पाकिस्तान के बीच लंबित कश्मीर मामले पर उसकी तटस्थता को प्रभावित नहीं करती.

जाहिर सी बात है कि डोकलाम मुद्दे के बाद चीन को समझ आ गया है कि पीएम मोदी पर दबाव डालना उसकी मूर्खता होगी क्युकि वो किसी दबाव में आएंगे नहीं. पीएम मोदी की ‘इंडिया फर्स्ट‘ पॉलिसी द्वारा चीन को पहले ही झटका दिया जा चुका है.

इसके तहत गेल इंडिया के द्वारा बनाई जा रही पाइपलाइन प्रॉजेक्ट्स में भारतीय कंपनियों को प्राथमिकता दे गयी, लिहाजा 3,000 करोड़ रुपये के पाइपलाइन प्रॉजेक्ट्स की दौड़ से चीन की कंपनियों को बाहर कर दिया गया है. ऐसे में भारत के साथ रिश्ते बिगाड़ने से केवल चीन का ही नुक्सान होगा. भारत के पास सहयोगियों की कमी नहीं और वहीँ चीन के लगभग सभी देशों के साथ रिश्तों में खटास है.

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